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मौजी बाबा श्री श्री 1008 श्री मौजीदास जी महाराज

ग्राम खाखोली, तहसील डीडवाना, जिला नागौर (राजस्थान) में भादौ (शुक्ल पक्ष) चान्दनी रात में द्वादश-त्रयोदशी तिथि मध्य ब्रह्म मुहुर्त में सुबह 4:05 बजे विक्रम संवत 1959 में पिता त्रिलोक (तिलोक) जांगिड परिवार में माता दलुदेवी की कोख से आपका जन्म हुआ। पिता धर्म प्रेमी, कर्मनिष्ठ, व्यक्तित्व के धनी थे एवं माता पति परायण सुशीला नारी रही थी। माता सरदारपुरा खुर्द के निवासी गंगाराम रोसांवा (जांगिड) की पुत्री थी। आपके दो भाई व एक बहिन क्रमशः किस्तुर मल, मोहन लाल किन्जा व श्रीमती सोनी देवी थी। आपका नाम हीरालाल जांगिड रखा गया। नाम अनुरूप आप बचपन से ही चमकने एवं दमकने लगे। आपको संस्कार मूलतः उनके माता पिता से प्राप्त हुए। आप अपने पिता के फर्नीचर व्यवसाय में उनका हाथ बंटाते रहते थे। किन्तु बचपन से ही हरि भजन कीर्तन की भावना हिलोरे लेती रहती थी और आखिरकार आपके हृदय से वैराग्य रूप भक्ति प्रस्फुटित होने लगी। इनका विवाह श्रीमती लक्ष्मी देवी सुपुत्री श्री कुशाल जांगिड निवासी दौलतपुरा (डीडवाना) के साथ हुआ और इनके आंगन में दो पुत्र रत्न मोटाराम जांगिड और मदन लाल जांगिड एवं दो पुत्री केसर बाई एवं ग्यारसी बाई का जन्म हुआ।
मौजी बाबा उर्फ हीरालाल को मामा जवान जी (सरदारपुरा वाले) भुसावल (महाराष्ट्र) लेकर गये। वे वहां फर्नीचर का कार्य किया करते थे। अतः हीरालाल भी फर्नीचर के व्यवसाय में कार्य करने लगे। फर्नीचर व्यवसाय का कारखाने के मालिक के कोई संतान नहीं थी जो व्यवसाय की देखरेख कर वंश को आगे बढ़ा सके, वह बहुत दुःखी रहता था। एक दिन हीरालाल ने सेठ को दुःखी देखकर कारण पूछ लिया। हीरालाल ने सेठ से दो खोपरे की बाटकी व अगरबत्ती मंगवाई। फिर खोपरे की बाटकी का हवन कर अगरबत्ती लगवाई और हवन की भभुती सेठ को देकर कहा- जाओ, अपनी धर्म पत्नी को यह भभुती पानी में घोलकर पिला देना। भोले बाबा तुझे लड़का दे देंगे। हवन की भभुती एवं हीरालाल के वचनानुसार चमत्कार हो गया और सेठानी के गर्भ ठहर गया एवं नौ महीने बाद पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। सेठजी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने हीरालाल को कहा- जो चाहे ले लो, रूपया, कपड़ा, प्लॉट इत्यादि। हीरालाल ने कहा - कल सुबह बताऊँगा।
बस भोले बाबा की कृपा से भक्ति प्रस्फुटित होने लगी। हीरालाल जी के अन्त:करण से वैराग्य उत्पन्न हो गया। वे मध्य रात्रि को फर्नीचर बनाने के औजार, कपड़े एवं सभी सामान वहीं भुसावल छोड़कर खाखोली गांव आ गये और शान्त होकर मौन धारण कर लिया। कुछ दिन बाद पुनः भक्तिमय वैराग्य उत्पन्न हुआ और भाव-विभोर होकर नाचने गाने लगे। भक्ति उनके रोम-रोम से निखरित होकर जगत में दमकने लगी। कभी मठ पर, कभी गलियारों में, कभी खेतों में, कभी मन्दिर में नाचने एवं गाने लगे। एक दिन स्वयं शंकर भगवान का स्वरूप धारण कर पंडित छोटूराम के लड़के गिरधारी को जो एक साल का था, अपनी गोद में लेकर खाखोली मठ पर चढ़कर मुंडेर पर नाचने लगे। गिरधारी की दादी घबरा गई और हीरालाल से कहा - हीरालाल गिरधारी भूखो है मने दे दे, इन्हें दूध पिलासू। मौजी बाबा कहने लगे - म्हारी मावड़ी ओ तो हनुमान है, इको कांई कोनी बिगड़े। फिर बाबा ने उसकी दादी को उस बच्चे को दे दिया। गिरधारी कालान्तर में बड़ा होकर प्रख्यात विद्वान पंडित बना और स्वयं बालाजी का भाव भी उन्हें आता था।
भक्ति के इसी सौपान में वे छतरियों में शंकर भगवान के मन्दिर से मुकुट पहनकर कुएं के भूण पर चढ़कर नाचते और भगवान का गुणगान करते तो कभी कृष्ण रूप धारण करके मधुर बाँसुरी बजाते। हीरालाल के भक्ति रूपी चमत्कार दिन-प्रतिदिन बढ़ते चले गये। भगवान के विभिन्न रूपों के दर्शन एवं मधुर ज्ञान को सुनकर जन-जन श्रोता मंत्रमुग्ध हो भक्ति रस में डुब जाते और हीरालाल के भक्त स्वरूप की प्रशंसा करते।
एक दिन गाँव के किसी दुष्ट व्यक्ति ने उन्हें अपशब्द बोल कर उनका अपमान किया। तब हीरालाल ने गुस्से में ग्राम खाखोली को जलाने की धमकी दे दी। वैराग्य धुन में घुमने लगे। तब इस व्यक्ति सहित गांव वालों ने इनके चाचा तनसुख को कहा - हीरालाल गांव को जलायेगा, इसलिए इनको बाँध दो। तनसुख तथा भाई किस्तुर मल दोनों ने मिलकर हीरालाल को पकड़कर बाड़े में नीम के पेड़ के नीचे ऊंट बाधने वाली लोहे की जंजीर से बांधकर ताला लगा दिया। महिना भर वहाँ बँधे रहे। उन्हें खाना पकड़ा देते एवं दैनिक कार्य से निवृत होने के लिए लोहे की जंजीर खोल देते और पुनः उन्हे बाँध देते। उस वक्त भी मौजी बाबा (हीरालाल) वहाँ बैठकर मिट्टी का मन्दिर बनाते और पास ही भजन करने के लिए गुफा बनाकर उसमें बैठ जाते और भजन करते रहते। एक दिन चाचा तनसुख व भाई किस्तुर ने हीरालाल के पास जाकर कहा – हीरालाल, हम तुम्हें अब बन्धन से मुक्त करते हैं। लेकिन गांव वालों को तंग मत करना। हीरालाल ने कहा – काका, मैं तो थाकों कायदो राख्यो है, वरना भगवान की इतनी कृपा है कि पलक झपकते ही जेल के ताले भी खुल जाते है। तब लोहे की जंजीर की क्या हैसियत है। यह सुनकर हीरालाल को बंधन से मुक्त कर दिया।
एक पूनम की रात्रि को करकेड़ी ग्राम में सांगलिया निवासी, संत शिरोमणी संन्यासी मानदास जी महाराज के पावन सानिध्य में भजन कीर्तन का भव्य कार्यकम हो रहा था। मानदास जी महाराज आसन पर विराजमान होकर सत्संग कर रहे थे। रात्रि करीब 11 बजे हीरालाल (मौजी बाबा) वहाँ पहुँचकर मानदास जी को नमन कर आसन के पास ही बैठ गये और कुछ देर बाद उन्होंने महाराज से नम्र निवेदन किया कि आप मेरे को अपनी शरण में लो। हीरालाल के आग्रह पर मानदास जी महाराज ने उन्हें निहारा और कुछ सोचते हुए कहा कि आप सर्वशक्ति पूर्ण है, आपके पास वो शक्ति है, जो मैं सहन नहीं कर सकता। अत: तुम कल फोगड़ी जाकर मेरे गुरू के स्थान पर पत्थर की शिला रखी है, उस पर विधि विधान से संतों की रीति रिवाज के अनुसार बैठकर स्नानादि पवित्र होकर शीघ्र सांगलिया आ जाना। मानदास जी महाराज के निर्देशानुसार हीरालाल ने ऐसा ही किया। फोगड़ी पहुँचकर सिर मुंडवाया एवं विधि विधान से शिला पर बैठते ही दिव्य शक्ति ने अद्भुत चमत्कार किया और उस दिव्य शक्ति के प्रभाव से वह 5 फीट दूर जा गिरे। फिर पुनः अपनी निर्मल संचित भक्ति द्वारा दिव्य शिला को विनम्र प्रणाम व पूजन कर उसी शिला पर बैठे और स्नान किया। नये कपड़े पहनकर गाजे बाजे के साथ खाखोली ग्राम होते हुऐ सांगलिया धूणी पर पहुँच गये। संत शिरोमणी मानदास जी महाराज के द्वारा संन्यास की दीक्षा लेकर भगवां वेश धारणकर भक्ति मार्ग की ओर अग्रसर हो गये। पूरे देश में तीर्थाटन कर भक्ति का संचार जन-जन में संचरित किया और लोक कल्याण कार्य करते हुए अपनी मानवीय जीवन को निःस्वार्थ भाव से सन्मार्ग पर लगा कर समर्पित हो गये।
मन मौजी होकर भजनरत रहने से वह भक्तों में हीरालाल से मौजीदास बाबा और फिर मौजी बाबा के नाम से विख्यात हो गये। भक्तों के मुखारविन्द के अनुसार वे साक्षात् शिव के स्वरूप थे। इनके हृदय स्वरूप में साक्षात् शिव दर्शन की अद्भुत अनुभूति होती रही है। अतः भक्त इन्हें बाबा मौजी महेश के नाम से पुकारने लगे। बाबा मौजी महेश ने जन कल्याण, अनेकों उपदेश, भजन, सोरठे, वचनावली और गीत इत्यादि के माध्यम से सत्संग कर मुक्ति का निर्मल और सरल मार्ग भक्तों को बताया। प्रभु नाम सुमिरन, परहित सेवा, निःस्वार्थ कर्म, योग और आसन इत्यादि दिव्य संस्कार भक्तों के मानस पटल पर अंकित कर दिया। सहज भक्ति को सर्वोपरि मानने वालों संतों के हितार्थ मोक्ष के द्वार सदैव के लिए उन्होंने खोल दिया। इन्होंने देश के विभिन्न भागों में ध्यान चेतन कर अघोर तप साधना की एवं भक्तों का दुःखोपचार कर उद्धार किया। नेपाल एवं देश विदेशों में भी जनोद्धार किया। विश्व के कोने-कोने में भक्त आपकी महिमा का सुमिरन कर तप साधना करते हैं एवं जनहितार्थ सेवायें देकर अपने जीवन को सफल बनाते हैं। आज भी इनके अनेकों शिष्य संत एवं भक्त संसार में बताये गये इनके मार्गों का अनुसरण कर निःस्वार्थ भाव से सेवा कार्य में सेवारत रहते हैं।
विक्रम संवत 2002 की साल में अड़कसर धूणी की स्थापना चैत्र नवरात्रा में बाबा साहब मौजी महेश के कर कमलों द्वारा स्थापना की गईं। बाबा मौजी महेश जी की धूणी अड़कसर (नागौर) पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। यहाँ श्री सांगलपति महाराज की शाखा पीठ स्थापित हुई है। इसकी स्थापना सीकर- डीडवाना मार्ग, बामणी तलाईं से 3 कि.मी. दक्षिण में सांगलिया की धूणी से 5 कि.मी. पास ही अड़कसर नामक स्थान पर संत शिरोमणि श्री मौजीदास जी के द्वारा स्थापना की गई है। कई दीन दुःखियों के कष्टों का निवारण किया। यहाँ पर अनेक संतों का आगमन हुआ। संत शिरोमणी श्री मौजी महाराज वचन सिद्ध संत थे। गुरू पद व गुरू महिमा के नाम को यहाँ विशेष महत्व दिया जाता है। आज भी मौजी बाबा की इस पावन स्थली में कई दीन दुःखी अपना दुःख मिटाने के लिए आते हैं।