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गुरू शिष्य परम्परा
(श्रद्धा समर्पण-निष्ठा)

कहा जाता है कि मनुष्य सर्वसमर्थ प्राणी है तथा अपने पुरूषार्थ के बल पर असंभव को भी सम्भव कर सकता है किन्तु यह सब कैसे? जब उसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में कोई शक्ति या प्रेरणा प्राप्त हो। एक मनुष्य की क्षमता, योग्यता, प्रतिभा आदि का विकास उपयुक्त परिस्थितियाँ प्राप्त होने पर ही सम्भव है। जिस प्रकार मात्र एकाकी पुस्तकीय अध्ययन के आधार पर कोई डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक नहीं बन सकता। पुस्तकें सर्व सुलभ होते हुए भी (आज तो सूचना क्रांति के युग में विभिन्न प्रकार की जानकारी सुलभ हैं उसे किसी योग्य शिक्षक, आचार्य व गुरू के मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है। इनके सहयोग व निर्देशों के बिना उस विषय वस्तु में पारंगत नहीं हो सकते। अतः पुस्तकीय अध्ययन के साथ-साथ समर्थ व्यक्ति के मार्गदर्शन की नितान्त आवश्यकता होती हैं।
जिस प्रकार भौतिक क्षेत्र में मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार आध्यात्मिक क्षेत्र (साधना) में भी यही नियम लागू होता है। बल्कि आध्यात्मिक जगत भौतिक जगत की तुलना में अधिक, अविज्ञात, रहस्यमय व सूक्ष्म है। भौतिक क्षेत्र में संबंधित व्यक्ति, पदार्थ, ज्ञान प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर है किन्तु अध्यात्म जगत पूर्णतः परोक्ष है। यहाँ भटकाव की सम्भावना अधिक है। यह सर्वविदित है कि जिस प्रकार एकाकी पुस्तकें व संबंधित सामग्री किसी भी क्षेत्र में पूर्णता से मार्गदर्शन करने में सक्षम नहीं हो सकती तो फिर साधना जैसे अज्ञात, परोक्ष, गूढ़ व रहस्यमय क्षेत्र में मार्गदर्शन हेतु समर्थ गुरू सत्ता की नितान्त आवश्यकता होती है।
हमारे आर्ष-ग्रन्थों में साधना में सफलता हेतु सद्गुरू रूपी मार्गदर्शक सत्ता की आवश्यकता व महत्ता को पदे पदे स्वीकार किया गया है। मध्यकाल में संत-मनीषी, कबीरदास जी ने जिन्होंने अंधविश्वासों व कुरीतियों पर खुलकर प्रहार किया, उन्होंने भी गुरू सत्ता के महत्त्व को निम्न शब्दों में स्वीकार किया -
यह तन विष की बेलरी, गुरू अमृत की खान ।
सीस दिए जो गुरू मिले, तो भी सस्ता जान ।।
सद्गुरू के परताप तें मिटि गयौ सब दुख दर्द ।
कह कबीर दुविधा मिटी, गुरू मिलिया रामानंद ।।
कबीरदास ने सद्गुरू को पाकर अपने को बड़भागी समझा। स्वयं को एक आदर्श शिष्य बनाया एवं जीवन भर के पुरूषार्थ से ऐसे अध्यात्म का प्रतिपादन कर गए, जो आज भी व्यावहारिक है। मानवी अंतःकरण मनीषियों ने सदैव यही कहा है कि आत्मिक प्रगति के लिए गुरु की सहायता आवश्यक है। शास्त्रकारों ने जिस गुरु तत्त्व की वंदना अभ्यर्थना की है, वह गुरु वास्तव में मानवी अंतःकरण है। इसी के माध्यम से निरंतर सद्शिक्षण और उर्ध्वगमन का प्रकाश हमें प्राप्त होता रहता हैं। किंतु इस अंतःकरण की अवज्ञा करते रहने से आत्मा की आवाज मंद पड़ जाती है, परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्ति दुर्बद्धिग्रस्त दुष्कर्मों में लिप्त पाये जाते हैं। अन्यथा सजीव आत्मा की प्रेरणा सामान्य स्थिति में इतनी प्रखर होती है कि कुमार्ग और अनुचित मार्ग का अनुसरण करना मनुष्य के लिए सम्भव ही नहीं हो सकता। अतः यह आत्मिक प्रखरता (शुद्ध मानवीय अंतःकरण) ही वस्तुतः वह मार्गदर्शन (गुरू सत्ता) है जिसकी महिमा ऋषि-मुनियों एवं मनीषियों ने की है।
किंतु इस अंतःकरण रूपी सद्गुरू की भूमिका बाद में प्रारम्भ होती है। सामान्यतः मानवीय अंतःकरण हमारे जन्म-जन्मांतरों के मल- विक्षोभों के आवरण से ढ़का रहता है, फलतः उसकी प्रेरणाओं का प्रकाश साधक को प्राप्त नहीं हो पाता। इसलिए शरीरधारी मार्गदर्शक सत्ता ( गुरू) की आवश्यकता होती है। उसकी कृपा अनुकम्पा से ही हमारा अंतःकरण आलोकित होता है तथा आंतरिक सद्गुरू के रूप में अपनी भूमिका संपादित करने में समर्थ होता है। अपवाद स्वरूप विरले ही ऐसे व्यक्तित्व होते है। जो आरम्भ से ही अपने एकाकी बलबूते और अंतःकरण प्रेरणा के आधार पर अपने लक्ष्य पर पहुँचने में समर्थ हुए। अध्यात्मक जगत में अपने एकाकी पुरूषार्थ द्वारा साक्षात्कार करने वाले संकल्प के धनी योगीराज अरविन्द, महर्षि रमण ऐसी विभूतियाँ हैं जो शताब्दियों में प्रकट होती है, जिनके कोई भौतिक गुरू नहीं थे। उन्होंने अपने अंतःकरण रूपी मार्गदर्शक सत्ता के माध्यम से साधन की ऊँचाईयों तक पहुँचकर जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त किया।
साधना के विधि-विधानों, क्रियाओं एवं उनकी परिणतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन आर्ष ग्रन्थों, योगशास्त्रों में मिलता है। परन्तु मात्र उन्हें पढ़कर साधना प्रारम्भ कर देना खतरे से खाली नहीं। शास्त्रों-धर्मग्रंथों की उपयोगिता उतनी ही है जितनी की विद्यालय में अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों को संबंधित पुस्तकों से मिलती है। फिर साधना जैसे अविज्ञात व सूक्ष्म जगत का मार्गदर्शन अकेले शास्त्र कैसे कर सकते हैं। अतः मार्गदर्शन हेतु समर्थ गुरू सत्ता की नितान्त आवश्यकता होती है।
गुरू-शिष्य परम्परा (समर्पण की पराकाष्ठा) – गुरु-शिष्य परम्परा हमारी सनातन संस्कृति के स्वर्णिम अध्याय का एक गौरवान्वित पक्ष है। हमारी अध्यात्मिक परम्परा गुरू प्रधान रही है। इसी परंपरा के कारण साधना पद्धतियों का सफल प्रयोग भी हुआ। गुरू-शिष्य परम्परा ने ही इस देश को इतने महामानव दिये, जिससे हम सब गौरवान्वित अनुभव करते हैं। उदाहणार्थ- गुरू गोविन्द पाद के शिष्य आद्यशंकर, जनार्दन पंत के शिष्य - एकनाथ, निवृत्तिनाथ के शिष्य - ज्ञानेश्वर, गहनीनाथ के शिष्य- निवृत्तिनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य - गोरक्षनाथ, रामानंद के शिष्य -कबीर, रैदास की शिष्या - मीरा, भारती तीर्थ के शिष्य - चैतन्य महाप्रभु, महर्षि अरविन्द की शिष्या -श्री मां, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य – विवेकानन्द, स्वामी विवेकानन्द के शिष्य - सदानन्द एवं भगिनी निवेदिता, विरजानंद के शिष्य – स्वामी दयानन्द, श्री सर्वेश्वरानन्द के शिष्य – पं. श्री राम शर्मा आचार्य, बुद्ध के शिष्य- आनन्द, चाणक्य के शिष्य -चन्द्रगुप्त, नागार्जुन के शिष्य कनहपा, व्यासजी के शिष्य -सूत शौनिक आदि इस परम्परा के जीवन्त व्यक्तित्व है।
श्रद्धा-समर्पण एवं निष्ठा - भारतीय संस्कृति में शिष्य की गुरू के प्रति जो श्रद्धा होनी चाहिए, उसकी तर्कसम्मत वैज्ञानिक व्याख्या पदे पदे दी गई हैं। जब समर्थ गुरु के प्रति समर्पण होता है व्यक्तित्व तत्सम हो जाता है। रामकृष्ण कहते थे - सामान्य गुरू कान फूंकते हैं, अवतारी महापुरूष प्राण फूंकते हैं। ऐसे सद्गुरू का स्पर्श- कृपादृष्टि ही पर्याप्त होती है। समर्थ सत्ता के प्रति श्रद्धा की परिपक्वता एवं समर्पण की पूर्णता शिष्य में अनन्त संभावनाओं के द्वार खोल देती हैं। इससे हृदय में एक निःशब्द शक्ति का प्रस्फुटन होने लगता है। फलतः प्रश्न उत्पन्न होने से पूर्व ही उत्तरित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप महाशून्य से उत्सर्जित चित्त शांति का निर्झर खुल जाता है। उक्त समर्पण से साधना उच्चत्तर आयामों तक पहुँचने लगती हैं। स्वामी विवेकानन्द ने एक सच्चे शिष्य के लिए चार शर्तों को आवश्यक माना है। इन पर खरा उतरने पर निश्चय ही गुरू कृपा बरसती हैं-
(1) सद् और असद् का विवेक
(2) ईश्वर प्राप्ति की तीव्रतम इच्छा
(3) इस लोक और परलोक की सभी कामनाओं का त्याग
(4) गुरू के प्रति अटूट निष्ठा
ये चारों ही महत्वपूर्ण हैं किन्तु साधना समर में सफल होने हेतु 'गुरू के प्रति अटूट निष्ठा अत्यन्त महत्वपूर्ण है। निष्ठा अर्थात् अक्षरशः पालन और कोई गति नहीं। गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करना। यहां गुरू सत्ता कोई शरीर नहीं, वह तो चैतन्य ब्रह्मरूप है। उन्हें शरीर रहने न रहने पर भी मानना उनकी आज्ञा का पालन करना सच्चे शिष्य के लिए पालन करने योग्य धर्म हैं। जो ऐसा करता है वह अपने इन्हीं शाश्वत संबंधों के कारण गुरू की अहेतु कृपा का अधिकारी बन जाता है। हमारे देश में ऐसी अहेतु कृपा के ढ़ेरों दृष्टांत हैं, जहां उन्हें सर्वोच्च लौकिक एवं पारलौकिक उपलब्धियां प्राप्त हुई। एक उदाहरण यहां प्रस्तुत करना समीचीन होगा - करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व एक विलक्षण योगी हुए- स्वामी भास्करानन्द जी। कानपुर के पास ग्रामीण अंचल के रहने वाले थे। वे अपनी हिमालयवासी गुरुसत्ता का निर्देश पाकर जीवन भर ज्ञान-विज्ञान की नगरी काशी में रहकर साधना करते रहे। गुरुसत्ता ने कहा कहीं जाना मत। सभी को सत्प्रेरणा देते रहना । इस लोक-परलोक का सारा वैभव तुम्हें मिल जाएगा। इतिहास साक्षी है कि उनकी तपश्चर्या की ख्याति बिना काशी से उनके बाहर निकले विश्व भर में सुगंधि की तरह फैल गई। प्रिंस ऑफ वेल्स, रूस के जार, जमैनी के चांसलर, मार्कट्वेन, राष्ट्र भर के राजा-महाराजा, उनकी चरण रजन लेने एवं कृपानुभूति के लिए आते थे। ऐसी सिद्धि मात्र गुरू आज्ञा के निर्वहन के कारण उन्हें मिली।
गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा का एक जीता जागता उदाहरण सिख धर्म की गुरू-शिष्य परम्परा हैं, जिसमें सद्गुरू को उनके निर्देशों को 'गुरुग्रंथ साहिब' को ही सब कुछ मानकर उनके प्रति सारा समर्पण किया जाता हैं। हमारे आर्ष साहित्य में गुरू को गोविन्द से भी बढ़कर ब्रह्म-विष्णु-महेश की उपमा दी गई हैं। समर्थ गुरू का आश्रय पाकर एक सामान्य क्षुद्र व्यक्ति भी अनन्त वैभव (लौकिक एवं पारलौकिक) को प्राप्त कर सकता हैं।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य - आज की परिस्थियों में जहां चारों ओर विकृत मानसिकता हावी है, भौतिकवाद चरमोत्सर्ष पर हैं। धर्मतंत्र भी उलझा हुआ है। अतः चिंतन करने पर प्रतीत होता है कि आज जीवन है पर जीवन मूल्य नहीं, व्यक्ति है पर व्यक्तित्व नहीं, बुद्धि है पर सद्बुद्धि का अभाव है, संसार है पर संस्कार नहीं, मनुष्य की आकृति है पर प्रकृति नहीं। जीवन के हर क्षेत्र में पतन और पराभव का साम्राज्य है। व्यक्ति के जीवन में हताशा और निराशा है, पारिवारिक जीवन में सुख-शांति का अभाव है, सामाजिक जीवन में शुचिता नहीं। ऐसी परिस्थिति में ऐसी मार्गदर्शक सत्ता जिसके अंदर मनुष्यता व आध्यात्मिकता चरम शीर्ष पर हो की आवश्यकता है। अतः आज राष्ट्र को ज्ञानवान प्रकाशवान तथा शक्तिवान बनाने के लिए गुरु-शिष्य परम्परा को जागृत करने की नितान्त आवश्यकता है, इसके बिना शाश्वत आनन्द की अनुभूति तो दूर, शांतिमय जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे देश में ऐसे व्यक्तित्व को सद्गुरू की संज्ञा दी गई है। उन्होंने हर युग में व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और मनुष्यता का मार्गदर्शन किया।
प्रश्न उठता है कि ऐसे व्यक्ति की सद्गुरू के रूप में कैसे पहचान व प्राप्ति हो। वर्तमान समय में ऐसी अनेकों घटनाएं सामने आती है जब कई व्यक्तियों ने ऐसे पाखण्डी व तथाकथित दिखावटी लोगों के चक्कर में अपना सर्वस्व खो दिया। ऐसी दशा में अपने अंतःकरण रूपी सद्गुरू की प्रेरणा से ऐसी मार्गदर्शन सत्ता से साक्षात्कार संभव है। इस हेतु उत्कट प्यास की आवश्यकता होती है, साथ ही परमात्म शक्ति का अनुग्रह। इस संदर्भ में हमारे राष्ट्र के महान् तत्त्ववेता मनीषी डॉ. गोपीनाथ कविराज का यह कथन अत्यन्त मनन करने योग्य हैं। वे कहा करते थे-
"सद्गुरू वर या बैल नहीं है, जिसे ढूंढ़ने के लिए दर-दर भटकना आवश्यक हो, अध्यात्मक जगत में प्यासे का कुएं के पास जाना अनिवार्य नहीं है। यहां कुआं प्यासे के पास जा सकता है बस प्यास सच्ची होनी चाहिए। तीव्र जिज्ञासा होने पर परमसत्ता गुरू के रूप में शिष्य के समक्ष स्वयं प्रकट हो जाती है।

-- डॉ. गुरुदत्त शर्मा, ब्यावर